मन का गुलाम | Power of Thoughts

 

सारा खेल मन का है विचारों की ताकत  | Power of Thoughts|

 Buddhist Story on Thoughts|

सारा खेल मन का है विचारों की ताकत  | Power of Thoughts|  Buddhist Story on Thoughts|


एक बार एक बौद्ध संन्यासी अपने कुछ शिष्यों के साथ एक गांव से गुजर रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि एक किसान अपनी गाय को रस्सी से बांध कर ले जाने की कोशिश कर रहे थे। किसान अपनी पूरी ताकत से उस गाय को अपनी तरफ खींच रहा था और वह गाय भी किसान को अपनी तरफ खींच रही थी। यह देखकर बौद्ध संन्यासी वहीं रुक गए और अपने शिष्यों को भी रुकने को कहा।

किसान बहुत देर तक उस गाय को किसी तरह लेकिन वह गाय एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी। बौद्ध संन्यासी ने अपने शिष्यों से पूछा बताओ किसने किसको बांध रखा है। इन दोनों में से कौन मालिक है और कौन गुलाम। शिष्यों ने कहा, ये तो साफ साफ दिख रहा है। गुरुजी कि किसान ने गाय को बंद रखा है या किसान मालिक है और गायें उसकी गुलाम।

क्योंकि किसान गाय को जहां खींचकर ले जाना चाहेगा गाय वहीं जाएगी। यह सुन बौद्ध संन्यासी ने कहा, ध्यान से देखना। आज मैं तू भी एक बहुत बड़ी सीख देने वाला। इतना कहकर बौद्ध संन्यासी ने अपनी झोली में से फल काटने वाली एक चाकू निकाली और उस किसान के पास जाकर उस रस्सी को काट दिया। जिस रस्सी से किसान ने गाय को बंद रखा था।

रस्सी कटते ही गाय बड़ी तेजी के साथ वहां से भाग निकली और वो किसान बौद्ध संन्यासी के ऊपर चिल्लाता हुआ उस गाय के पीछे भागने लगा। बौद्ध संन्यासी ने रास्ते में किसान की तरफ इशारा करते हुए कहा, अब बताओ कौन मालिक है और कौन गुलाम। गाय को इस किसान में जरा भी रुचि नहीं। यहां तक कि गाय तो हमेशा से ही इस किसान से दूर भागना चाहती है।

लेकिन ये किसान ही है जो इस गाय से बना हुआ है। तभी तो इस गाय के भागते ही ये किसान उसके पीछे भागने लगा। बौद्ध संन्यासी ने आगे कहा कि इस गाय की तरह हमारे मन में भरी गंदगी को भी हमें कोई रूचि नहीं है बल्कि हम ही हैं जो इस मानसिक कचरे के साथ खुद को बांध के रखते हैं। खुद को जोड़े में रखते हैं। जिस पल से हमने इस मानसिक कचरे पर अपनी रुचि दिखानी बंद कर दी।

उसी पल से ये सारे बुरे विचार हमारे मन से गायब होना शुरू हो जाएंगे कि किसी गाय की तरह मन के सारे बुरे विचार हमसे दूर भागेंगे और फिर गायब हो जाएंगे। दोस्तो अगर हम ध्यान से देखें तो पाएंगे कि उस किसान की जैसी हालत हमारे मन की भी है।

हम खुद को बहुत सी चीजों का मालिक समझते हैं, लेकिन असल में हम मालिक नहीं बल्कि गुलाम मालिक तो वो चीजें हैं क्योंकि हम उनके बिना नहीं रह सकते कि उस गाय की तरह हमारे मन में भरी गंदगी जिसे नफरत, गुस्सा, जलन, डर इत्यादि की हमें कोई रुचि नहीं है, लेकिन हमारी इसमें रुचि है। हमने ही इन्हीं सालों से अपने अंदर पाल रखा है।

इन्हें पकड़ के रखा है। हम ही हैं जो इन चीजों से खुद को दूर नहीं करना चाहती। इनकी पकड़ ढीली नहीं करना चाहती क्योंकि पकड़ ढीली होते ही ये हमसे दूर भागने शुरू कर देंगी, जो हमें पसंद नहीं आएगा, क्योंकि जाने अनजाने में हमें इन सब मानसिक विकृतियों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना लिया है। अब हमें इनके साथ ही आनंद आता है। अगर हम इन्हें छोड़ना भी चाहते हैं तो हमारा मन हमें बार बार इसमें उलझा देता है।

लेकिन अगर एक बार पूरी दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ हमने अपने मन में भरे कचरे से दूरी बनानी शुरू कर दी। तब हम इन विचारों की वैधता को महसूस कर पाएंगे और फिर ये सारा मानसिक कचरा किसान की उस गाय की तरह हमसे दूर भागना चाहेगा।

और फिर हमेशा के लिए गायब हो जाएगा। एक बात हमेशा याद रखो उस और शांत रहना एक चुनाव है तो क्यों न हम इसे चुनें और अपने इस छोटे से जीवन को पूरी खुशी और शांति के साथ जीत जाने अनजाने में ही सही, लेकिन हमारे विचार ही हमारे जीवन की रूपरेखा तय करते हैं।

हम सब कभी न कभी हालातों से परेशान होकर अपनी किस्मत को कोसना शुरू कर देते हैं। हमें लगता है कि बुरी किस्मत की वजह से ही हम डिप्रेशन में हैं और इसी के चलते हमारे कामकाज रिश्ते नाते सब नाकामयाब हो रहे हैं।

लेकिन अगर मैं आपसे कहूं कि हमारी हर परेशानी का कारण हमारे खुद के विचार हैं तो आप कहेंगे कि मैंने तो अपने लिए कभी ऐसा कुछ नहीं चाहा कि ऐसा किया। इस बात को डिटेल में जानने के लिए कि कैसे हमारे विचार हमारी जिन्दगी को बनाते हैं।

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आज आप खुश हैं या दुखी सफल या असफल। उनसे एक बार पूछिए कि इसका कारण क्या है। अगर आप थोड़ा गहराई में जाएंगे तो पाएंगे कि इन सबका कारण हम खुद हैं या खुद से मतलब है हमारे विचार। हमें जैसा भी बीज अपने अंदर। ये था। सही समय आने पर वह बीज अवश्य अंकुरित होता है कि चाहिए। बीज एक महीने पहले बोया गया हो। एक साल पहले या फिर 10 साल पहले ये अपना असर अवश्य दिखाएगा। अगर ही विचार का बीज अच्छा था तो परिणाम भी अच्छे ही होंगे।

अगर गलत विचार का बीज बोया गया था तो आज हम उसके परिणाम की गलती कैसे करेंगे। अब सवाल उठता है कि जो बुरे विचार के बीच पहले बोए जा चुके हैं, क्या उनके प्रभाव को पूरी तरीके से खत्म किया जा सकता है।

तो इसका उत्तर है नहीं उनके प्रभाव को सिर्फ कम किया जा सकता है और ये सुनिश्चित किया जा सकता है कि आज से मनरूपी इस जमीन पर केवल अच्छे और सफल परिणाम देने वाले विचारों के बीजों को ही बोया जाए ताकि आने वाले समय में हम सही परिणामों की फसल काट सकें। अब सवाल ये भी उठता है कि हमारे दुखों असफलता और नकरात्मक विचारों का मूल कारण क्या है तो इसका जवाब है। अपने विचारों के प्रति सजग न होना उनका आत्म विश्लेषण न करना।

हमारे दिमाग में हर रोज लगभग 20 हज़ार विचार आते हैं और इसमें से ही कुछ विचार नकारात्मक होते हैं जो हमारे आत्मविश्वास को कम कर हमारे अंदर हीनता पैदा करते हैं और फिर आज नहीं तो कल ये हीन भावना हमें असफलता का रास्ता दिखाती है।

अगर हम थोड़ा सा सजग होकर इस बात पर ध्यान दें कि आखिर हम किस तरह की बातें और सोच के रहते हैं तो हम ज्यादा आसानी से नकारात्मक विचारों को हटाकर सकरात्मक विचारों को मन में जकडे सकते हैं, लेकिन ये एक दिन में नहीं होने वाला। इसमें समय लगेगा और महीने दो महीने तक अभ्यास करने के बाद इसका असर दिखना शुरू हो जाएगा।

अगर आज हमने बगीचे रूपी मन पर सही विचार का पौधा लगाया है और इसे समय समय पर खाद और पानी दिया है या खाद और पानी से मतलब है। समय समय पर खुद के मन को साफ करते रहना तो आने वाले समय में हमें सफलता शांति और खुशी के पल चखने को मिलेंगे। इसलिए हमेशा अपने विचारों के प्रति सजग रहें। मन में सकारात्मक विचारों को जगह दी और समय समय पर उनका आत्मविश्लेषण करते रहें। आपके जीवन में सफलता और खुशी अपनी आवाजाही।

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